नई दिल्ली. देशभर में पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा (E20 ब्लेंड) बढ़ाए जाने के बाद से वाहनों की परफॉर्मेंस को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। कई लोग यह दावा कर रहे हैं कि E20 पेट्रोल से गाड़ियों का इंजन खराब हो रहा है और माइलेज घट रहा है। अब केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इन तमाम आशंकाओं पर स्थिति साफ की है। गडकरी ने स्पष्ट किया है कि E20 पेट्रोल से वाहनों के माइलेज पर थोड़ा बहुत असर पड़ सकता है, लेकिन इससे गाड़ी के इंजन को कोई नुकसान नहीं होगा।
क्या है E20 पेट्रोल और क्यों घटेगा माइलेज?
इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में नितिन गडकरी ने बताया कि एथेनॉल की कैलोरिफिक वैल्यू यानी ऊर्जा की मात्रा पेट्रोल की तुलना में कम होती है। इसलिए, पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ने पर औसत माइलेज में मामूली गिरावट आ सकती है। हालांकि, ज्यादातर मामलों में यह असर ना के बराबर होता है।
गडकरी ने कहा, “एथेनॉल और पेट्रोल की कैलोरिफिक वैल्यू में अंतर एक सच्चाई है। लेकिन माइलेज आपके ड्राइविंग की कंडीशन पर भी निर्भर करता है।” उन्होंने दिल्ली या मुंबई जैसे शहरों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बंपर-टू-बंपर ट्रैफिक के कारण गाड़ियां निचले गियर में चलती हैं और बार-बार ब्रेक लगाना पड़ता है। स्पीड मुश्किल से 40-50 किमी/घंटा तक जाती है। हालांकि, अगर आप लगातार 100 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से गाड़ी चलाते हैं, तो शायद आपको माइलेज में थोड़ा अंतर दिखे।
सोशल मीडिया के दावे एक ‘झूठा नैरेटिव’
सोशल मीडिया पर इंजन खराब होने के दावों को गडकरी ने सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामले बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए जा रहे हैं और यह एक सोचे-समझे ‘झूठे नैरेटिव’ का हिस्सा है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा, “मुझे एक भी ऐसी कार दिखाएं जिसे E20 फ्यूल की वजह से नुकसान हुआ हो।”
गडकरी ने बताया कि देश भर में E20 ब्लेंड (20% एथेनॉल और 80% पेट्रोल) को पिछले साल पुणे स्थित टेस्टिंग लैब ARAI (ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया) और वाहन निर्माताओं की ओर से कई टेस्ट में पास होने के बाद ही लॉन्च किया गया था। जिन मामलों में इंजन खराब होने की बात सामने आई, जब कंपनियों ने उनकी जांच की, तो पता चला कि इसके लिए ‘मिलावटी ईंधन’ जिम्मेदार था, न कि E20 पेट्रोल।
पुरानी कारों के पार्ट्स फ्री में बदलेंगी कंपनियां
पुरानी कारों के कुछ हिस्सों पर पड़ने वाले मामूली असर को लेकर गडकरी ने एक बड़ा अपडेट दिया है। उन्होंने कहा कि फ्लेक्स इंजन को लेकर कई चीजें सीखी गई हैं और मैटेरियल कंप्लायंस में सुधार हुआ है। पुरानी कारों में इस्तेमाल होने वाले वॉशर पहले धातु के होते थे, लेकिन अब वे रबर के बनाए जा रहे हैं। मंत्री ने बताया कि वाहन निर्माता कंपनियों को निर्देश दिए गए हैं कि जब पुरानी कारें सर्विसिंग के लिए आएं, तो ग्राहकों से बिना कोई अतिरिक्त पैसा लिए (फ्री में) उन वॉशर्स को बदल दिया जाए।
एथेनॉल और फ्लेक्स-फ्यूल: सस्ता और बेहतर विकल्प
गडकरी ने बताया कि परफॉर्मेंस के मामले में एथेनॉल पेट्रोल से बेहतर साबित हुआ है। इसमें शानदार एंटी-नॉकिंग गुण और हाई ऑक्टेन नंबर होता है। वे 2004 से एथेनॉल की वकालत कर रहे हैं।
आ रही हैं नई कारें, ब्राजील मॉडल पर काम
टाटा मोटर्स, महिंद्रा, हुंडई, टोयोटा किर्लोस्कर और मारुति सुजुकी जैसी लगभग एक दर्जन कंपनियां अब फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल ला रही हैं। सरकार का लक्ष्य जनता को अलग-अलग कीमत वाले कई ईंधन विकल्प (Multiple blends) देना है, ठीक उसी तरह जैसे ब्राजील 1970 से 27% ब्लेंड का इस्तेमाल कर रहा है।
गडकरी ने बताया कि एथेनॉल की कीमत लगभग 75 रुपये प्रति लीटर है, जो काफी किफायती है। वहीं, हाइब्रिड फ्लेक्स वाहनों में इलेक्ट्रिक कंपोनेंट होने से बैटरी में ऊर्जा बचती है जिससे और भी फायदा होता है।
डीजल का भी मिल गया देसी विकल्प
पश्चिमी एशियाई संकट का जिक्र करते हुए गडकरी ने कहा कि हमें जीवाश्म ईंधन के आयात के सभी विकल्पों को तलाशने की जरूरत है। भारत अभी 2 लाख करोड़ रुपये का जीवाश्म ईंधन आयात करता है, जिससे भारी प्रदूषण होता है। इसके विकल्प के रूप में ये चीजें सामने आई हैं।
मेथनॉल: कर्नाटक में अशोक लेलैंड ने 15% मेथनॉल-डीजल ब्लेंड का 25 बसों में 3 महीने तक सफल परीक्षण किया है। इसके बाद उन्होंने ट्रकों और बसों के लिए एक खास मेथनॉल इंजन भी तैयार कर लिया है। असम पेट्रो-केमिकल्स हर दिन 700 टन मेथनॉल का उत्पादन कर रही है, जिसकी कीमत मात्र 20-22 रुपये प्रति लीटर है, जबकि डीजल लगभग 110 रुपये प्रति लीटर है। इससे लागत में भारी बचत होगी और पूर्वोत्तर में इसका इस्तेमाल बढ़ेगा।
आइसो-ब्यूटेनॉल: यह डीजल का एक बेहतरीन विकल्प है, क्योंकि एथेनॉल को सीधे डीजल इंजन में नहीं मिलाया जा सकता। किर्लोस्कर ने हाल ही में दो जनरेटर सेट तैयार किए हैं जो 100% आइसो-ब्यूटेनॉल और एथेनॉल पर सफलतापूर्वक चल रहे हैं।
अगर ट्रैक्टर, कृषि उपकरणों और कंस्ट्रक्शन वाहनों में आइसो-ब्यूटेनॉल या स्वदेशी ईंधन (CNG, एथेनॉल, मेथनॉल) का इस्तेमाल शुरू हो जाए, तो भारत का डीजल आयात पूरी तरह खत्म हो जाएगा।













