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नाव पर सवार होकर आएंगी आषाढ़ गुप्त नवरात्रि में माता रानी, आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 15 जुलाई से आरंभ

सनातन धर्म में नवरात्रि का विशेष महत्व होता है। नवरात्रि के दिनों में देवी मां के नव स्वरूपों की पूजा आराधना की जाती है। साल में चार बार नवरात्रि का पर्व मनाया जाता है जिसमें एक चैत्र नवरात्रि दूसरा शारदीय नवरात्रि और दो गुप्त नवरात्रि। तंत्र मंत्र की साधना में लीन रहने वाले लोगों के लिए गुप्त नवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। श्री लक्ष्मीनारायण एस्ट्रो सॉल्यूशन अजमेर की निदेशिका ज्योतिषाचार्या एवं टैरो कार्ड रीडर नीतिका शर्मा ने बताया कि इस वर्ष आषाढ़ गुप्त नवरात्रि 15 जुलाई से आरंभ होकर 22 जुलाई को समाप्त होंगे लेकिन चतुर्थी तिथि का क्षय और नवमी तिथि की वृद्धि होने से गुप्त नवरात्रि का उत्थापन और व्रत पारण 23 जुलाई को होगा। इन नवरात्रों में 10 महाविद्याओं की पूजा करने का विशेष विधान शास्त्रों में बताया गया है। इस दौरान तंत्र विद्या का विशेष महत्व है। गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं की पूजा-अर्चना की जाती है। जब भी नवरात्रि बुधवार से प्रारंभ होती है तो मां नौका में सवार होकर आती हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार, यह वाहन अच्छी वर्षा, समृद्धि और कृषि में उन्नति का प्रतीक है। माता रानी के भक्त गुप्त नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन श्रद्धालु निराहार या फलादार रहकर मां दुर्गा की अराधना करते हैं। प्रतिपदा तिथि में घर व मंदिर में कलश स्थापना की जाएगी।

नवरात्रि का पावन त्योहार आदिशक्ति मां दुर्गा को समर्पित माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, साल भर में कुल चार नवरात्रि आते हैं। जिसमें से दो चैत्र व शारदीय और दो गुप्त नवरात्रि होती हैं। आषाढ़ मास में पड़ने वाले नवरात्रि को आषाढ़ गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। गुप्त नवरात्रि में 10 महाविद्याओं मां काली, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता छिन्नमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धुम्रावती, मां बंगलामुखी, मातंगी और कमला देवी की पूजा की जाती है। इस समय की गई साधना जन्मकुंडली के समस्त दोषों को दूर करने वाली तथा चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और कोक्ष को देने वाली होती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण समय मध्य रात्रि से सूर्योदय तक अधिक प्रभावशाली बताया गया है। आषाढ़ माह में पड़ने वाली नवरात्रि को भी गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। इस दौरान प्रतिपदा से लेकर नवमी तक मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। गुप्त नवरात्रि में साधक महाविद्याओं के लिए खास साधना करते हैं।

देवी मां दुर्गा के वाहन
यूं तो मां दुर्गा का वाहन सिंह को माना जाता है। लेकिन हर साल नवरात्रि के समय तिथि के अनुसार माता अलग-अलग वाहनों पर सवार होकर धरती पर आती हैं। यानी माता सिंह की बजाय दूसरी सवारी पर सवार होकर भी पृथ्वी पर आती हैं। माता दुर्गा आती भी वाहन से हैं और जाती भी वाहन से हैं।
देवीभाग्वत पुराण में जिक्र किया गया है कि
शशि सूर्य गजरुढा शनिभौमै तुरंगमे। गुरौशुक्रेच दोलायां बुधे नौकाप्रकीर्तिता॥
इस श्लोक में सप्ताह के सातों दिनों के अनुसार देवी के आगमन का अलग-अलग वाहन बताया गया है। अगर नवरात्रि का आरंभ सोमवार या रविवार को हो तो इसका मतलब है कि माता हाथी पर आएंगी। शनिवार और मंगलवार को माता अश्व यानी घोड़े पर सवार होकर आती हैं। गुरुवार या शुक्रवार को नवरात्रि का आरंभ हो रहा हो तब माता डोली या पालकी पर आती हैं। बुधवार के दिन नवरात्रि पूजा आरंभ होने पर माता नाव पर आरुढ़ होकर आती हैं। नवरात्रि का विशेष नक्षत्रों और योगों के साथ आना मनुष्य जीवन पर खास प्रभाव डालता है। ठीक इसी प्रकार कलश स्थापन के दिन देवी किस वाहन पर विराजित होकर पृथ्वी लोक की तरफ आ रही हैं इसका भी मानव जीवन पर विशेष असर होता है।

नाव पर सवार होकर आएंगी माता दुर्गा
नवरात्रि में माता दुर्गा के वाहन का विशेष महत्व होता है। बुधवार से शुरुआत होने पर माता नौका पर सवार होकर आती हैं। नवरात्र जिस दिन से शुरू होती है, उसी के आधार पर माता के वाहन का निर्धारण होता है। बुधवार से शुरुआत होने पर माता नौका पर सवार होकर आती हैं। देवी भागवत पुराण के अनुसार, यह वाहन अच्छी वर्षा, समृद्धि और कृषि में उन्नति का प्रतीक है। कृषि प्रधान महाकौशल अंचल के लिए इसे विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है। मान्यता है कि माता का नौका पर आगमन भक्तों के कष्ट दूर करने के साथ खुशहाली का संदेश देता है। मां जगदंबे का नौका यानी नाव पर आगमन शुभ माना जाता है। नाव पर सवार होकर माता जब भी आती हैं तब अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं और सभी कष्ट हर लेती हैं।

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि तिथि
वैदिक पंचांग के अनुसार इस साल आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का आरंभ बुधवार 15 जुलाई से हो रहा है। 14 जुलाई को दोपहर 3:14 मिनट पर आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि का आरंभ होगा, जो अलगे दिन यानी 15 जुलाई को सुबह 11:52 मिनट कर व्याप्त रहेगी। उदया तिथि के अनुसार, 15 जुलाई से ही आषाढ़ गुप्त नवरात्रि की शुरुआत होगी। वहीं 23 जुलाई को नवमी तिथि रहेगी जिसके साथ ही आषाढ़ गुप्त नवरात्रि का समापन होगा।
आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा तिथि प्रारंभः 14 जुलाई को दोपहर 3:14 मिनट पर
प्रतिपदा तिथि समापनः 15 जुलाई को सुबह 11:52 मिनट
उदया तिथि में आषाढ़ गुप्त नवरात्रिः 15 जुलाई 2026

आषाढ़ नवरात्रि घट स्थापना
प्रतिपदा तिथि में घट स्थापना यानी मां के आवाहन से ही नवरात्रि का अनुष्ठान शुरू होता है। आषाढ़ गुप्त नवरात्रि पर 15 जुलाई को ही घट स्थापना की जाएगी। जिसका शुभ मुहूर्त पुष्य नक्षत्र में होगा। इस दिन सुबह 8:02 मिनट का समय घट स्थापना के लिए सर्वोत्तम होगा। आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा में 15 जुलाई बुधवार को पुष्य नक्षत्र, हर्षण योग एवं सिद्ध योग में गुप्त नवरात्र शुरू होगा।
घटस्थापना मुहूर्त: प्रातः 6:01 से 10:17 बजे तक
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 4:11 से 4:52 बजे तक
घटस्थापना का शुभ समय 15 जुलाई को सुबह 06:01 बजे से 10:17 बजे तक रहेगा। इस अवधि में पूजा करना अत्यंत शुभ माना गया है।

आषाढ़ गुप्त नवरात्रि
15 जुलाई 2026, बुधवार – पहला नवरात्र – घटस्थापना, मां शैलपुत्री की पूजा
16 जुलाई 2026, गुरुवार – दूसरा नवरात्र – मां ब्रह्मचारिणी पूजा
17 जुलाई 2026, शुक्रवार – तीसरा और चौथा नवरात्र – मां चन्द्रघण्टा और मां कूष्माण्डा की पूजा
18 जुलाई 2026, शनिवार – पांचवां नवरात्र – मां स्कन्दमाता पूजा
19 जुलाई 2026, रविवार – छठा नवरात्र – मां कात्यायनी पूजा
20 जुलाई 2026, सोमवार – सातवां नवरात्र – मां कालरात्रि पूजा
21 जुलाई 2026, मंगलवार – आठवां नवरात्र – दुर्गा अष्टमी, मां महागौरी पूजा
22 जुलाई 2026, बुधवार – नौवां नवरात्र – मां सिद्धिदात्री पूजा, महा नवमी
23 जुलाई 2026, गुरुवार – नवरात्रि व्रत का पारण

गुप्त नवरात्रि में करें ये उपाय
सुबह-शाम दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। दोनों वक्त की पूजा में लौंग और बताशे का भोग लगाएं। मां दुर्गा को लाल रंग के पुष्प ही चढ़ाएं। मां दुर्गा के विशिष्ट मंत्र ‘ऊं ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडाय विच्चे’ का सुबह-शाम 108 बार जप करें। गुप्त नवरात्रि में अपनी पूजा के बारे में किसी को न बताएं।

गुप्त नवरात्रि के व्रत नियम
गुप्त नवरात्रि के दौरान मांस-मदिरा, लहसुन और प्याज का बिल्कुल सेवन नहीं करना चाहिए। मां दर्गा स्वयं एक नारी हैं, इसलिए नारी का सदैव सम्मान करना चाहिए। जो नारी का सम्मान करते हैं, मां दुर्गा उन पर अपनी कृपा बरसाती हैं। नवरात्रि के दिनों में घर में कलेश, द्वेष या अपमान नहीं करना चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से बरकत नहीं होती है। नवरात्रि में स्वच्छता का विशेष ख्याल रखना चाहिए। नौ दिनों तक सूर्योदय से साथ ही स्नान कर साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। नवरात्रि के दौरान काले रंग के वस्त्र नहीं धारण करने चाहिए और ना ही चमड़े के बेल्ट या जूते पहनने चाहिए। मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान बाल, दाढ़ी और नाखून नहीं काटने चाहिए। नवरात्रि के दौरान बिस्तर पर नहीं बल्कि जमीन पर सोना चाहिए। घर पर आए किसी मेहमान या भिखारी का अपमान नहीं करना चाहिए।

मां दुर्गा के इन स्वरूपों की होती है पूजा
मां कालिके, तारा देवी, त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, माता चित्रमस्ता, त्रिपुर भैरवी, मां धूम्रवती, माता बगलामुखी, मातंगी, कमला देवी की पूजा की जाती है।

पूजा सामग्री
मां दुर्गा की प्रतिमा या चित्र, सिंदूर, केसर, कपूर, जौ, धूप,वस्त्र, दर्पण, कंघी, कंगन-चूड़ी, सुगंधित तेल, बंदनवार आम के पत्तों का, लाल पुष्प, दूर्वा, मेंहदी, बिंदी, सुपारी साबुत, हल्दी की गांठ और पिसी हुई हल्दी, पटरा, आसन, चौकी, रोली, मौली, पुष्पहार, बेलपत्र, कमलगट्टा, जौ, बंदनवार, दीपक, दीपबत्ती, नैवेद्य, मधु, शक्कर, पंचमेवा, जायफल, जावित्री, नारियल, आसन, रेत, मिट्टी, पान, लौंग, इलायची, कलश मिट्टी या पीतल का, हवन सामग्री, पूजन के लिए थाली, श्वेत वस्त्र, दूध, दही, ऋतुफल, सरसों सफेद और पीली, गंगाजल आदि।

पूजा विधि
सुबह जल्दी उठकर सभी कार्यो से निवृत्त होकर नवरात्र की सभी पूजन सामग्री को एकत्रित करें। मां दुर्गा की प्रतिमा को लाल रंग के वस्त्र में सजाएं। मिट्टी के बर्तन में जौ के बीज बोएं और नवमी तक प्रति दिन पानी का छिड़काव करें। पूर्ण विधि के अनुसार शुभ मुहूर्त में कलश को स्थापित करें। इसमें पहले कलश को गंगा जल से भरें, उसके मुख पर आम की पत्तियां लगाएं और उस पर नारियल रखें। कलश को लाल कपड़े से लपेटें और कलावा के माध्यम से उसे बांधें। अब इसे मिट्टी के बर्तन के पास रख दें। फूल, कपूर, अगरबत्ती, ज्योत के साथ पूजा करें। नौ दिनों तक मां दुर्गा से संबंधित मंत्र का जाप करें और माता का स्वागत कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करें। अष्टमी या नवमी को दुर्गा पूजा के बाद नौ कन्याओं का पूजन करें और उन्हें तरह-तरह के व्यंजनों (पूड़ी, चना, हलवा) का भोग लगाएं। आखिरी दिन दुर्गा के पूजा के बाद घट विसर्जन करें, मां की आरती गाएं, उन्हें फूल, चावल चढ़ाएं और बेदी से कलश को उठाएं।

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