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अक्षय तृतीया 2026: एक ही पर्व, लेकिन शहर और गांव की परंपरा में बड़ा अतंर?

अक्षय तृतीया हिंदू धर्म का बेहद ही खास और पवित्र पर्व है, जिसे ‘अबूझ मुहूर्त’ के नाम से भी जाना जाता है. यानी एक ऐसा दिन जब आप किसी खास ज्योतिषीय गणना के भी विवाह, खरीदारी या नए कामों की शुरुआत कर सकते हैं.

शास्त्र बताते हैं कि, इस दिन किए गए शुभ कार्य और दान कभी खत्म नहीं होते, इसलिए इसे अक्षय कहा गया है. लेकिन बदलते समय के साथ इस पर्व को मनाने के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है, खासतौर पर शहर और गांव के बीच इस फर्क को साफ तौर पर देखा जा सकता है.

अक्षय तृतीया 2026 में कब?
हिंदू पंचांग के अनुसार, अक्षय तृतीया रविवर 19 अप्रैल को पड़ेगी, क्योंकि इस दिन तृतीया तिथि सूर्योदय के समय विद्यमान रहेगी. तिथि की शुरुआत 19 अप्रैल को सुबह 10.59 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 20 अप्रैल की सुबह तक रहेगी. ऐसे में किसी भी तरह की खरीदारी या नए कार्यों की शुरुआत करने के लिए आपके पास 19 अप्रैल का पूरा दिन रहने वाला है.

शहर बनाम ग्रामीण अक्षय तृतीया का बदलता स्वरूप
गांव और शहर में अक्षय तृतीया के बीच का अंतर साफ-साफ देखा जा सकता है. जहां शहरों में अक्षय तृतीया अब धीरे-धीरे एक ‘उपभोग का त्योहार’ में बदलती जा रही है. बड़े ज्वेलरी ब्रांड्स इस दिन अच्छे-खासे डिस्काउंट और ऑफर्स चलाते हैं, जिससे लोग सोना खरीदने के लिए आकर्षित होते हैं. डिजिटल गोल्ड, ईटीएफ और प्रॉपर्टी जैसी चीजें भी इसी दिन खरीदी जाती हैं.

एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में हर साल कुल सोने की मांग का एक बड़ा हिस्सा इसी तरह के त्योहारों के दौरान आता है. हालांकि साल 2025 में सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने की वजह से अक्षय तृतीया पर मांग में करीब 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई थी, लेकिन कुल वैल्यू के लिहाज से मार्केट स्थिर बना रहा.

यह इस चीज को दर्शाता है कि, शहरों में लोग आस्था से अधिक मार्केट ट्रेंड और निवेश के नजरिए से इस दिन को देखने लगे हैं.

गांव में अक्षय तृतीया का उत्सव अलग क्यों?
बात की जाए ग्रामीण क्षेत्रों की तो यहां आज भी अक्षय तृतीया का मूल स्वरूप कायम है. यहां लोग इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं, जल और अनाज का दान करते हैं और कृषि से जुड़े कार्यों की शुरुआत करने के लिए शुभ मानते हैं.

सोना खरीदना यहां भी होता है, लेकिन यह दिखावे या निवेश की रणनीति से नहीं, बल्कि परंपरा के हिस्से के रूप में किया जाता है. कई जगहों पर तो लोग सोना खरीदने की बजाय जरूरतमंदों को दान देना अधिक पुण्यकारी मानते हैं.

शहर और ग्रामीण में ऐसा अंतर क्यों?
अक्षय तृतीया के दिन शहरी लोग “मैं क्या खरीद रहा हूं” के नजरिए से देखा जाता है, जबकि गांवों में “मैं क्या दे रहा हूं” ज्यादा प्राथमिकता देते हैं. यही कारण है कि जहां शहरों में अक्षय तृतीया एक बड़े मार्केट आयोजन में बदलती जा रही है, वहीं गांवों में यह अब भी आस्था, परंपरा और सामाजिक संतुलन का प्रतीक बनी हुई है.

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस दिन सोना खरीदना समृद्धि और लक्ष्मी की कृपा का प्रतीक माना जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि, आज के समय में काफी लोग इस परंपरा को समझने की बजाय केवल धार्मिक ट्रेंड के आधार पर फैसला लेते हैं. बिना जरूरत के खर्च करना या केवल दिखावे के लिए खरीदारी करना इस पर्व की मूल भावना के बिल्कुल उलट है.

बात साफ है कि, अक्षय तृतीया का असली मतलब केवल सोना खरीदना नहीं, बल्कि ऐसे कार्यों को करना है जिसका फल लंबे समय तक बना रहे. शहरों ने इस त्योहार को बाजार के नजरिए से देखना शुरू कर दिया है, जबकि गांवों में यह अब भी आस्था और संतुलन का प्रतीक है. अब यह हर व्यक्ति पर निर्भर करता है कि, वह इस दिन मात्र खरीदारी का अवसर बनाता है या इसे सही मायनों में अक्षय बनाने की कोशिश करता है.

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