अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध फिर शुरू हो गया है। पिछले एक महीने से छाई खामोशी एक बार फिर भीषण सैन्य टकराव में बदल गई है। अमेरिकी सेना ने रविवार को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में स्थित ईरान के लारक द्वीप पर बड़ा हमला कर दिया। इससे ईरान आगबबूला हो गया है। ईरान ने पलटवार करते हुए जोर्डन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को मिसाइलों और ड्रोन से निशाना बनाया है।
बता दें कि इससे पहले दोनों देशों के बीच बीते 6 महीने से ही संघर्ष जारी है। अमेरिका और इजरायल ने मिलकर बीते 28 फरवरी को ईरान पर बड़ा हमला कर दिया था। इसके बाद से ईरान ने भी जवाबी हमले किए हैं। दुनिया के सबसे प्रमुख समुद्री जलमार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ होर्मुज इन सब के बीच जंग का अखाड़ा बन गया है जहां लगातार हमले हो रहे हैं। अब अमेरिका ने एक बार फिर यहां अटैक किया है। 29 जुलाई के बाद से ईरान पर अमेरिका का यह पहला सीधा सैन्य हमला है।
लारक द्वीप US ने बोला धावा
अमेरिका के सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, ताजा हमले होर्मुज में जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित रखने के लिए की गई है। अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के सैनिक लारक द्वीप पर ऐसे रॉकेट तैयार कर रहे थे जिनसे समुद्री बारूदी सुरंगे दागी जानी थीं। IRGC ने पुष्टि की कि अमेरिकी हमले में कई सैन्य कर्मियों और नागरिकों की मौत हुई है और कई घायल हुए हैं।
ईरान ने अमेरिकी एयरबेस पर दागीं मिसाइलें
ईरान ने भी अमेरिका के हमलों का तुरंत जवाब दिया है। अमेरिकी हमले के कुछ ही घंटों बाद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने आधिकारिक बयान जारी कर जोर्डन में अमेरिकी ठिकानों पर हमले की जिम्मेदारी ली। ईरान ने जोर्डन स्थित अमेरिकी संचालित किंग हुसैन एयरबेस और अल-अजरक एयरबेस पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। ईरान की सरकारी मीडिया IRIB ने दावा किया है कि इन हमलों में अमेरिकी ठिकानों के रखरखाव, तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर और लड़ाकू विमानों के ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा है। हालांकि अमेरिकी सूत्रों के अनुसार उनके एयर डिफेंस सिस्टम ने लगभग सभी ईरानी मिसाइलों को हवा में ही मार गिराया।
ट्रंप पर बढ़ रहा दबाव
गौरतलब है कि अमेरिका ने ताजा हमले ऐसे समय में किए हैं जब नवंबर में अमेरिका में मिडटर्म चुनाव होने हैं और ईरान युद्ध को लेकर घरेलू राजनीति गरमा गई है। डेमोक्रेटिक सीनेटर जैक रीड ने ट्रंप प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा कि छह महीने बाद भी युद्ध का कोई घोषित लक्ष्य हासिल नहीं हुआ है और इससे मिडिल ईस्ट में अमेरिका की स्थिति कमजोर हुई है। ऐसे में US पर दबाव बढ़ रहा है।














