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सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की बताई स्पष्ट सीमा, कहा- वोटर लिस्ट से नाम कटने पर नागरिकता नहीं जाती

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि संविधान के तहत चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने वाला अधिकारी नहीं है। न्यायालय ने मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के मकसद से वोटर की नागरिकता की जांच करने में उसकी भूमिका सीमित है। यह स्पष्टीकरण एक मामले की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे, उन्हें सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा था। इनमें सार्वजनिक वितरण प्रणाली, महिलाओं के लिए नकद हस्तांतरण योजना, अन्नपूर्णा योजना और यहां तक कि जाति प्रमाण पत्र का सत्यापन भी शामिल है।

चुनाव आयोग को अधिकारी नहीं है कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं
बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर न्यायालय के 27 मई के फैसले का ज़क्रि करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायाधीश जॉयमाल्य बागची और न्यायाधीश वी. मोहना की पीठ ने कहा कि कानूनी स्थिति पहले ही साफ़ कर दी गई थी कि चुनाव आयोग यह तय करने वाला अधिकारी नहीं है कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं।

सक्षम अधिकारी ही नागरिकता पर ले सकते फ़ैसला
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘हमने अपने बिहार एसआईआर फैसले में बताया था कि अगर आयोग को किसी वोटर की नागरिकता पर शक है, तो वह वोटर लिस्ट से उसका नाम हटा सकता है, लेकिन उसकी यह जिम्मेदारी भी है कि वह नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत फैसले के लिए मामले को सही अधिकारी के पास भेजे। न्यायालय ने कहा कि प्रभावित लोग कलकत्ता उच्च न्यायालय जा सकते हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक नागरिकता कानून के तहत सक्षम अधिकारी इस मामले पर फ़ैसला नहीं ले लेते, तब तक उस व्यक्ति का नागरिक का दर्जा बना रहेगा, ताकि वह नागरिकों को मिलने वाले फ़ायदों और अधिकारों (जैसे कल्याणकारी योजनाओं) का लाभ उठा सके।

जो नागरिक शर्तों को पूरा करे वोटर लिस्ट में उसे शामिल करे चुनाव आयोग
चुनाव आयोग की भूमिका के बारे में बताते हुए न्यायाधीश बागची ने कहा कि कानून को लेकर कोई भ्रम नहीं है और चुनाव आयोग ही वोटर लिस्ट तैयार करने और उसे बनाए रखने का काम देखता है और उस पर नियंत्रण रखता है। एसआईआर प्रक्रिया के दौरान नागरिकता के सवाल पर उच्चतम न्यायालय ने 27 मई के अपने फ़ैसले में कहा था, ‘जिन मामलों में आयोग को यह यकीन नहीं होता कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए कानूनी शर्तों को पूरा करता है, वहां आयोग की यह ज़िम्मेदारी होगी कि वह ऐसे व्यक्ति के मामले को कानून के अनुसार फ़ैसले के लिए केंद्र सरकार के सक्षम अधिकारी के पास भेजे।

33 लाख से ज़्यादा लोगों की अपील की जांच
आयोग का फ़ैसला सिफऱ् चुनावी मक़सद तक ही सीमित होता है, इसलिए नागरिकता के सवाल पर उसे अंतिम नहीं माना जा सकता। इसलिए, इस आधार पर नाम हटाने का कोई भी फ़ैसला संबंधित अधिकारी द्वारा किए जाने वाले फ़ैसले के नतीजे पर निर्भर करेगा।’ यह स्पष्टीकरण उन 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल के कामकाज से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया, जो 33 लाख से ज़्यादा उन अपीलों की जांच कर रहे हैं, जिन्हें उन लोगों ने दायर किया था जिनके नाम पश्चिम बंगाल एसआईआर के दौरान वोटर लिस्ट से हटा दिए गए थे। ऐसा मुख्य रूप से एक ही परिवार के लोगों के नामों की स्पेलिंग में अंतर के कारण हुई ‘ताकिर्क विसंगतियों’ की वजह से हुआ था।

नागरिकता के सबूत को पासपोर्ट के तौर पर स्वीकार किया जाना चाहिए
शंकरनारायणन ने न्यायालय को बताया, ‘33.5 लाख अपीलें लंबित हैं और जिन मामलों का निपटारा हो चुका है, उनमें से 70 प्रतिशत में अपील मंज़ूर की गई है। इस बीच, जब तक इन पर फ़ैसला होता है, उन्हें पीडीएस और दूसरी योजनाओं से बाहर कर दिया जाता है। अक्टूबर में नगरपालिका चुनाव होने हैं। इस तरह बाहर करने का सिलसिला जारी रहेगा।’ उन्होंने कहा कि पासपोटर् को नागरिकता के सबूत के तौर पर स्वीकार किया जाना चाहिए।

पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में लाखों वोटर अपने वोट का इस्तेमाल नहीं कर पाए, क्योंकि एसआईआर के दौरान वोटर लिस्ट से उनके नाम हटा दिए गए थे। नाम हटाने के ख़लिाफ़ उनकी अपीलें उन अपीलेट ट्रिब्यूनल के पास लंबित थीं जिन्हें उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत बनाया गया था, क्योंकि न्यायालय ने पहले एसआईआर की प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। न्यायालय ने इस मामले में आगे की सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तिथि तय की है।

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