मुंबई. जाह्नवी कपूर इन दिनों ‘पेद्दी’ में उनके सेक्सुअलाइज्ड लुक को लेकर चर्चा में चल रही हैं. लोग डायरेक्टर बुच्ची बाबू सना की आलोचना कर रहे हैं. अब सिंगर सोना मोहपात्रा ने भी इस पर प्रतिक्रिया दी है. सोना ने कहा है कि हीरोइंस को अक्सर “सजावट के रूप में पेश किया जाता है, जिन्हें सेक्सुअलाइज और ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है. उन्होंने कहा कि जबकि टॉक्सिक मर्दानगी को रोमांस के रूप में दिखाया जाता है. एक वीडियो शेयर कर राम चरण स्टारर इस फिल्म पर चल रहे विवाद पर प्रतिक्रिया दी है.
सोना मोहपात्रा ने कहा कि ‘पेद्दी’ में महिला किरदार को गलत तरीके दिखाने के खिलाफ हालिया नाराजगी ने उन्हें उम्मीद दी है. क्योंकि दर्शक अब फिल्म निर्माताओं को स्क्रीन पर महिलाओं की प्रस्तुति के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. उन्होंने कहा, “पिछले कुछ दिनों में एक चीज़ ने मुझे अजीब सा सुकून दिया है. हमारी भारी प्रचारित मेनस्ट्रीम फिल्म में, हीरोइन की प्रस्तुति के खिलाफ नाराजगी ने मुझे कुछ उम्मीद और सकारात्मकता दी है.
सोना मोहपात्रा ने आगे कहा, “लगता है इसका असर कुछ फिल्म निर्माताओं पर पड़ा है, जो इंटरव्यू में कह रहे हैं कि वह बहुत मासूम है और कुछ हिस्से हटाए जाएंगे.” उन्होंने कई फिल्मों के फॉर्मूले पर ध्यान दिलाते हुए कहा कि जहां हीरो को आमतौर पर रिस्पेक्टिव लाइफ जीते हुए दिखाया जाता है, वहीं हीरोइन सिर्फ उसकी कहानी का एक्सटेंशन होती है.
सोना मोहपात्रा ने टोक्सिक मर्दानगी को बताया रोमांस
सोना मोहपात्रा ने कहा, “अब, मैंने न तो ‘पेद्दी’ देखी है और न ही ‘पुष्पा’, देखने का कोई इरादा भी नहीं था. लेकिन सच कहूं तो हम सब इन फिल्मों का फॉर्मूला और टेम्पलेट जानते हैं. हीरो हमेशा रिस्पेक्टिव लाइफ जीता है. और हीरोइन बस उस कहानी का विस्तार होती है. सजावट, जिसे सेक्सुअलाइज और ऑब्जेक्टिफाई किया जाता है. टॉक्सिक मर्दानगी को रोमांस कहा जाता है ऐसी फिल्मों में. अपमान को स्टाइल बना दिया जाता है. कुछ स्लो मोशन शॉट्स, कुछ रणनीतिक कैमरा एंगल्स, हीरोइन के ‘मुझे देखो, मुझे देखो’ टाइप कपड़े, तेज बैकग्राउंड म्यूजिक. हम जानते हैं ये सब. और ज्यादातर मामलों में, मिजोगिनी बॉक्स ऑफिस पर जीतती है. लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ है.”
सोना मोहपात्रा ने फिल्मों को लोगों की सोच को प्रभावित करने वाला बताया
सोना मोहपात्रा ने आगे कहा, “दिलचस्प बात यह है कि भारत के लोगों ने अपनी असंतुष्टि जाहिर की है. चाहे हीरो का पीछा करना हो या छेड़छाड़, रोज़ आने वाली खबरें, बच्चों के साथ रेप, घरेलू हिंसा. और मुझे लगता है लोग समझ रहे हैं कि ऐसी फिल्में समाज में सोच और व्यवहार को कैसे प्रभावित करती हैं. क्योंकि ज्यादातर हमारी फिल्मों में, ये कहानी नहीं होती. राइटर्स को मेहनत नहीं करनी पड़ती. कोई दिक्कत नहीं. पितृसत्ता डाल दो.”















