भारत में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की कोशिशों का असर अब धीरे-धीरे आंकड़ों में भी दिखाई देने लगा है. पिछले कुछ सालों में देश में शिशु मृत्यु दर यानी जन्म के बाद एक साल के अंदर बच्चों की मौत के मामलों में कमी दर्ज की गई है. यह बदलाव इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अस्पतालों में डिलीवरी, मेटरनल हेल्थ सर्विस और नवजात बच्चों की देखभाल को लेकर जागरूकता बढ़ी है. हालांकि, तस्वीर पूरी तरह से अच्छी नहीं कही जा सकती है.
देश के कुछ राज्यों ने शिशु मृत्यु दर कम करने में शानदार काम किया है, जबकि कई राज्य अब भी काफी पीछे हैं. खासकर ग्रामीण इलाकों में हालात चिंता बढ़ाने वाले हैं, जहां आज भी कई नवजात बच्चे जन्म के कुछ ही दिनों या महीनों के अंदर दम तोड़ देते हैं. सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) की 2024 की रिपोर्ट में सामने आए आंकड़ों ने देशभर में बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में शिशु मृत्यु दर में गिरावट जरूर आई है, लेकिन राज्यों के बीच बड़ा अंतर अब भी बना हुआ है.
देश में कितनी घटी शिशु मृत्यु दर?
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शिशु मृत्यु दर (IMR) 2019 में प्रति 1000 जिंदा जन्म पर 30 थी, जो 2024 में घटकर 24 हो गई है यानी हर साल औसतन एक अंक की गिरावट दर्ज की गई. अब पहले के मुकाबले कम बच्चे जन्म के बाद एक साल के अंदर अपनी जान गंवा रहे हैं. इसे स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार का बड़ा संकेत माना जा रहा है फिर भी हालात पूरी तरह बेहतर नहीं हुए हैं. रिपोर्ट बताती है कि देश में अब भी हर 42 में से एक बच्चा अपने पहले बर्थडे तक नहीं पहुंच पाता है. ग्रामीण इलाकों में स्थिति और ज्यादा गंभीर है, जहां हर 37 में से एक बच्चे की मौत हो जाती है.
किन राज्यों में सबसे खराब स्थिति?
रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ में शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा दर्ज की गई. यहां प्रति 1000 बच्चों पर 36 शिशुओं की मौत हुई. इसके बाद उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश का स्थान रहा, जहां IMR 35 दर्ज किया गया. इन राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ हॉस्पिटल में डिलीवरी बढ़ाने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी. नवजात बच्चों की देखभाल, पोषण और समय पर इलाज भी उतना ही जरूरी है.
इन राज्यों ने किया शानदार प्रदर्शन
जहां कुछ राज्य पीछे हैं, वहीं कई राज्यों ने बेहतरीन प्रदर्शन भी किया है. केरल में देश की सबसे कम शिशु मृत्यु दर दर्ज की गई, जो सिर्फ 8 रही. इसके बाद हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु और दिल्ली का स्थान रहा, जहां IMR 11 दर्ज हुआ. विशेषज्ञों का कहना है कि इन राज्यों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, जागरूकता और महिलाओं की शिक्षा का स्तर अच्छा होने से बच्चों की मौत के मामलों में कमी आई है.
ग्रामीण इलाकों में अब भी ज्यादा खतरा
रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में शिशु मृत्यु दर शहरों की तुलना में ज्यादा बनी हुई है. असम में ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच सबसे ज्यादा अंतर देखने को मिला. ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी, डॉक्टरों की उपलब्धता और जागरूकता की कमी इसके बड़े कारण माने जा रहे हैं. रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कई राज्यों में लड़कों और लड़कियों की शिशु मृत्यु दर में अंतर है. बिहार में यह अंतर सबसे ज्यादा देखा गया. बिहार में लड़कों की IMR 21 रही, जबकि लड़कियों की 25 दर्ज की गई. वहीं जम्मू-कश्मीर में स्थिति उलटी रही, जहां लड़कों की मृत्यु दर लड़कियों से ज्यादा थी.
जन्म के पहले 28 दिन सबसे ज्यादा खतरनाक
विशेषज्ञों के मुताबिक, शिशुओं की ज्यादातर मौतें जन्म के बाद पहले 28 दिनों के अंदर होती हैं. इसे नवजात मृत्यु दर (Neo-Natal Mortality Rate) कहा जाता है. देश में कुल शिशु मौतों में लगभग 73 प्रतिशत मौतें जन्म के पहले 28 दिनों के अंदर हुईं. भारत की नवजात मृत्यु दर 18 प्रति 1000 जिंदा जन्म दर्ज की गई. इस मामले में भी केरल सबसे बेहतर राज्य रहा, जहां यह दर सिर्फ 6 रही, वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह दर सबसे ज्यादा 26 रही,उत्तर प्रदेश भी 25 के आंकड़े के साथ चिंता बढ़ाने वाले राज्यों में शामिल रहा.














